परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा और उनका योगदान | Dr Homi Jehangir Bhabha Biography Hindi

Dr Homi Jehangir Bhabha Biography Hindi

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साल 1965 में, डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो पर एक इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू में उन्होंने एक ऐसा ऐलान किया जिससे दुनिया के बड़े-बड़े देश हैरान रह गए। भाभा ने कहा, ‘अगर मुझे छूट मिल जाए तो मैं 18 महीने में भारत के लिए परमाणु बम बना सकता हूं।’

इस इंटरव्यू के तीन महीने बाद 24 जनवरी 1966 को एयर इंडिया के बोइंग 707 विमान ने मुंबई से लंदन के लिए उड़ान भरी, लेकिन वह पहुंच नहीं सका। यह विमान यूरोप के आल्प्स माउंटेन रेंज में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में 117 लोगों की जान चली गई, उनमें भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा भी शामिल थे।

Dr Homi Jehangir Bhabha Biography Hindi | होमी जहांगीर भाभा और उनका योगदान

होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ। उनके पिता जहांगीर भाभा एक मशहूर वकील थे। Dr Homi Jehangir Bhabha की प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के कैथेड्रल स्कूल से हुई। इसके बाद आगे की पढ़ाई जॉन केनन स्कूल में हुई। शुरू से ही भाभा को भौतिक विज्ञान और गणित में विशेष रुचि थी।

मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी की परीक्षा पास की। साल 1927 में Dr Homi Bhabha आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गये और वहां उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। साल 1934 में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

पूरा नामहोमी जहांगीर भाभा
जन्मदिन (Birthday)30 अक्टूबर 1909
जन्म स्थान (Birthplace)बॉम्बे, बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत (वर्तमान में मुंबई, महाराष्ट्र, भारत)
मृत्यु की तारीख (Date of Death)24 जनवरी 1966
मृत्यु की वजह (Reason of Death)मोंट ब्लांक के पास एयर इंडिया की उड़ान 101 क्रैश
राष्ट्रीयताभारतीय
शिक्षा (Education)विज्ञान में स्नातक, परमाणु भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि
स्कूल (School)बॉम्बे के कैथेड्रल और जॉन कॉनन स्कूल
कॉलेज (Collage)एलफिंस्टन कॉलेज,
रॉयल विज्ञान संस्थान,
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के कैयस कॉलेज,
धर्म (Religion)हिन्दू
जातियतापारसी
क्षेत्रपरमाणु वैज्ञानिक
संस्थानCavendish Laboratories,
भारतीय विज्ञान संस्थान,
टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान,
परमाणु ऊर्जा आयोग (भारत)
शिक्षाकैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
डॉक्टरी सलाहकारपॉल डिराक, रॉल्फ एच फाउलर
डॉक्टरी शिष्यबी भी श्रीकांतन
प्रसिद्धिभाभा स्कैटेरिंग

भाभा ने जर्मनी में कॉस्मिक किरणों का अध्ययन किया और उन पर कई प्रयोग भी किये। 1933 में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने से पहले, भाभा ने “द ऑब्जर्वेशन ऑफ कॉस्मिक रेडिएशन” शीर्षक से एक थीसिस प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने कॉस्मिक किरणों को अवशोषित करने और इलेक्ट्रॉन उत्पन्न करने की क्षमता का प्रदर्शन किया। इस शोध पत्र के लिए उन्हें 1934 में ‘आइजैक न्यूटन स्टूडेंटशिप’ भी प्राप्त हुई।

1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ा तो Dr Homi Jehangir Bhabha भारत में छुट्टियां मना रहे थे और उन्हें वहीं रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। बाद में वह इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलोर में शामिल हो गए और 1940 में रीडर के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में कॉस्मिक किरणों की खोज के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की।

कॉस्मिक किरणों की खोज ने उन्हें विशेष प्रसिद्धि दिलाई और 1941 में उन्हें रॉयल सोसाइटी का फेलो चुना गया। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए 1944 में मात्र 31 साल की उम्र में उन्हें प्रोफेसर बना दिया गया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. होमी जहाँगीर भाभा को शास्त्रीय संगीत, मूर्तिकला, चित्रकला और नृत्य के क्षेत्र में गहरी रुचि और ज्ञान था। वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी.वी. रमन उन्हें ‘भारत का लियोनार्डो दा विंची’ भी कहते थे।

साल 1944 में, Dr Homi Bhabha ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को भौतिकी अनुसंधान के लिए एक संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव दिया, जिसके बाद भारतीय परमाणु अनुसंधान के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना की गई।

भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। नेहरू को केवल दो लोग भाई कहते थे, एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे थे डॉ. होमी जहांगीर भाभा। Dr Homi Bhabha ने अपने सभी पत्रों में नेहरू को मेरे प्रिय भाई कहकर संबोधित किया है।

इंदिरा गांधी ने संसद में अपने एक भाषण में इस बात का जिक्र किया था कि Dr Homi Jehangir Bhabha अक्सर नेहरू को देर रात में फोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे।

Nuclear Program | परमाणु कार्यक्रम

Dr Homi Jehangir Bhabha Nuclear Weapons Program

Dr Homi Jehangir Bhabha ने भारत के परमाणु कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने देश की आजादी के तुरंत बाद साल 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की और उसी वर्ष नेहरू द्वारा उन्हें परमाणु कार्यक्रम का निदेशक बनाया गया। 1955 में, उन्होंने परमाणु कार्यक्रमों पर संयुक्त राष्ट्र सभा की अध्यक्षता की, जिसमें 73 देशों के 1,428 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

प्रधानमंत्री नेहरू को डॉ. भाभा पर पूरा भरोसा था। प्रधानमंत्री नेहरू न केवल विज्ञान के महत्व को समझते थे बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में हमेशा एक कदम आगे बढ़कर सहयोग करते थे। कम से कम इस मामले में वह आसानी से हतोत्साहित नहीं होते थे। साथ ही डॉ. भाभा उन्हें विज्ञान की हर छोटी-बड़ी बात की जानकारी भी देते रहते थे।

इसका उदाहरण 29 फरवरी 1948 को तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को लिखे एक पत्र से मिलता है। नेहरू लिखते हैं, “मेरी डॉ. होमी भाभा से अभी बातचीत हुई है, उन्होंने मुझे परमाणु ऊर्जा अनुसंधान पर एक विस्तृत रिपोर्ट दी है। मुझे इसमें बहुत दिलचस्पी है और मेरा मानना ​​है कि हमें इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाना शुरू कर देना चाहिए। हालाँकि, इससे कोई तत्काल परिणाम नहीं मिलेगा, भविष्य उन्हीं का होगा लेकिन जो परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम होंगे।”

Nuclear Weapons Program | परमाणु हथियार कार्यक्रम

होमी जहांगीर भाभा जानते थे कि दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए भारत को परमाणु शक्ति बनने की जरूरत है, इसलिए उन्होंने तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को इसके लिए मना लिया। बाद में उन्होंने परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान ट्रॉम्बे (AEET) की स्थापना की जिसका नाम बदलकर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) कर दिया गया।

1961 में भारत-चीन युद्ध छिड़ गया और भारत की हार के बाद Dr Homi Bhabha ने सार्वजनिक रूप से परमाणु हथियारों पर अपना काम तेज़ कर दिया। सरकार ने भी समर्थन किया और तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-1966) में परमाणु रिएक्टरों से उत्पन्न बिजली को शामिल किया।

1963 में, राजस्थान में भारत का पहला न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते में, कई सख्त नियम शामिल थे जो यह सुनिश्चित करते थे कि इनका उपयोग युद्ध और अन्य सैन्य गतिविधियों में नहीं किया जाएगा।

डॉ. भाभा की रुचि अंतरिक्ष कार्यक्रम में भी थी। एक ओर, जब भारतीय परमाणु ऊर्जा अनुसंधान अपनी प्रारंभिक अवस्था में था, तभी 1959 में, रूस ने स्पुतनिक उपग्रह को अंतरिक्ष में लॉन्च किया। डॉ. भाभा को जल्द ही एहसास हुआ कि अंतरिक्ष अब अनुसंधान (रिसर्च) के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन जाएगा।

इस प्रकार, 1963 में स्पेस फिजिक्स पर पहली संगोष्ठी में उन्होंने अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करने के भारत के प्रयासों पर जोर देते हुए कहा, “अगर हम आज ऐसा (स्पेस अनुसंधान) नहीं करते हैं, तो बाद में हमें अधिक कीमत पर जानकारी के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना होगा।”

अत: प्रधानमंत्री नेहरू की सहमति से अंतरिक्ष अनुसंधान के सुचारू संचालन के लिए 1962 में इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च (INCOSPAR) की स्थापना की गई, जिसे 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में परिवर्तित कर दिया गया।

इसी बीच 1963 में डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत केरल के थुम्बा गांव से एक साउंडिंग रॉकेट लॉन्च के साथ की। दुर्भाग्य से, इससे पहले कि यह विचार वास्तविकता में बदल पाता, 24 जनवरी 1966 को डॉ. भाभा का निधन हो गया।

Homi Bhabha Death | होमी जहांगीर भाभा की मृत्यु

उस दिन डॉ. भाभा को जिनेवा जाना था और इसके लिए वे एयर इंडिया की फ्लाइट 101 में सवार हुए जिसका नाम ‘कंचनजंगा’ था। विमान में 106 यात्री और 11 क्रू मेंबर सवार थे। मुंबई से उड़ान भरने के बाद ये फ्लाइट दिल्ली में रुकी और इसके बाद ये बेरूत पहुंची जहां इसे एक बार फिर रुकना पड़ा। बेरूत से इसने जिनेवा के लिए उड़ान भरी।

24 जनवरी, 1966 को जिनेवा में उतरने से कुछ मिनट पहले विमान आल्प्स की पहाड़ियों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

जब बचाव दल पहुंचा तब विमान का नामोनिशान मिट चुका था। विमान का मलबा ग्लेशियर में धंस चुका था। वहां केवल कुछ दैनिक उपयोग की वस्तुएं और पत्र आदि ही मिले। न तो ब्लैक बॉक्स मिला और न ही मलबा पूरी तरह बरामद हुआ। खराब मौसम के कारण फ्रांसीसी अधिकारियों ने रेस्क्यू ऑपरेशन रोक दिया।

सितंबर 1966 में जांच फिर से शुरू हुई, लेकिन कुछ नहीं मिला। फ्रांसीसी सरकार ने बताया कि बेरूत से उड़ान के दौरान विमान के एक उपकरण में खराबी आ गई थी। जांच के दौरान जिनेवा कंट्रोल रूम को सूचित किया गया कि लैंडिंग के दौरान जमीन की दूरी मापने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला उपकरण (वेरी हाई फ्रिक्वेंसी ऑमिनी रेंज VOR) खराब था।

पायलट ने कंट्रोल रूम को बताया था कि उसकी ऊंचाई 19000 फीट है। वह मोंट ब्लांक पहाड़ी से 3000 फीट ऊपर है। कंट्रोल रूम ने रडार की मदद से पायलट को विमान की स्थिति स्पष्ट की और उसे उतरने के लिए कहा।

जांच अधिकारियों ने कहा कि पायलट से गलती हुई है। उसने सोचा कि वह ग्लेशियर के सबसे ऊंचे पर्वत मोंट ब्लांक को पार कर गया है, जबकि ऐसा नहीं हुआ और लैंडिंग के दौरान विमान आल्प्स में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस थ्योरी पर बहुत कम विश्वास था, लेकिन चूंकि यह एक आधिकारिक निष्कर्ष था, इसलिए इस पर विश्वास किया गया। और फ्रांसीसियों के तर्क को भारत सरकार ने भी स्वीकार कर लिया।

Homi Bhabha Death France Report

New Theory | नयी थ्योरी

फ्रांस की सरकारी न्यूज एजेंसी ORTF के एडिटर फिलीपे रेयाल इस थ्योरी को अस्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने अपने कैमरामैन और पत्रकारों को ग्लेशियर दुर्घटनास्थल पर भेजा। इसके बाद 1843 नामक पत्रिका में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

रिपोर्टों में कहा गया है कि फिलीपे को वहां सबूत के दो टुकड़े मिले। वहां एक विमान का टुकड़ा मिला, जिस पर तारीख जून 1960 लिखी हुई थी, जबकि एयर इंडिया का जो विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, उसका निर्माण 1961 में हुआ था।

इसके अलावा विमान के अगले हिस्से का एक पीले रंग का टुकड़ा भी मिला जो एयर इंडिया के विमान का नहीं था। इसके बाद फिलिप की टीम ने आगे की जांच के लिए मोंट ब्लैंक जाने का फैसला किया, लेकिन फ्रांसीसी सरकार के एक मंत्री ने ORTF टीम को वापस बुला लिया।

मामला लगभग शांत हो चुका था और जब टीम वापस लौट रही थी तो टीम के एक सदस्य ने सबके सामने अपना पक्ष रखा। उसने कहा कि एयर इंडिया का विमान पहाड़ी से नहीं बल्कि दूसरे विमान से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। इस थ्योरी को बल तब मिला जब टीम के लौटते ही उनकी खोज में मिली चीजों को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।

अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA की साजिश का दावा

हादसे के 42 साल बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने साजिश का दावा किया: साल 2008 में CIA एजेंट रॉबर्ट क्राउली और अमेरिकी पत्रकार ग्रेगरी डगलस के बीच कथित बातचीत पर एक किताब प्रकाशित हुई। कन्वर्सेशन विद द क्रो नाम की इस किताब के मुताबिक, भारत जैसे देश द्वारा परमाणु हथियार बनाने की घोषणा के बाद अमेरिका चिंतित हो गया था।

साल 1945 के बाद से, संयुक्त राज्य अमेरिका परमाणु हथियारों से लैस एकमात्र देश बना हुआ है। 1964 में सोवियत संघ और चीन दोनों ने परमाणु परीक्षण किया और फिर 1965 में Dr Homi Bhabha ने ऑल इंडिया रेडियो को एक इंटरव्यू दिया। जिसमें उन्होंने कहा कि भारत 18 महीने में परमाणु हथियार बना लेगा। इस इंटरव्यू के ठीक तीन महीने बाद Dr Homi Jehangir Bhabha की एक विमान दुर्घटना में जान चली गयी।

इससे पहले, लाल बहादुर शास्त्री जी ने भारत-चीन युद्ध के मद्देनजर परमाणु हथियारों के परीक्षण को और तेज करने की मंजूरी दी थी। इस किताब में लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत के लिए भी CIA को जिम्मेदार ठहराया गया है।

इस किताब में CIA ऑफ़िसर रॉबर्ट क्राउली और पत्रकार ग्रेगरी डगलस के बीच हुई बातचीत का विवरण दिया गया है। किताब में एक जगह क्राउली ग्रेगरी से कहता हैं, ‘आप जानते हैं कि 60 के दशक में जब भारत ने परमाणु बम पर काम करना शुरू किया था तब हम मुसीबत में थे क्योंकि क्योंकि वो रशियन्स के साथ थे।’

आगे बोलते हुए उसने विमान हादसे के बारे में कहा, ‘यकीन मानिए, यह बहुत खतरनाक था। भाभा न्यूक्लियर मामले में वियना जा रहे थे और इससे और बड़ी दिक़्क़तें खड़ी हो सकती थीं। तभी उनके विमान में बम विस्फोट हो गया और विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।

2017 में एक शख्स ने नई थ्योरी दी

फ्रांस के पुराने बिजनेसमैन और स्पोर्ट्समैन डेनियल रौश को विमान हादसों में बहुत इंट्रेस्ट रहता था। जैसे ही उन्हें इस विमान दुर्घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने खोजबीन शुरू कर दी।

साल 2017 में, उन्हें आल्प्स की पहाड़ियों में विमान का मलबा मिला। इसके बाद एक-एक कर उन्हें सीट बेल्ट, कॉकपिट का हिस्सा, एक फ्लेयर पिस्टल, दस्तावेजों से भरा बैग, एक कैमरा आदि मिल गया।

साल 2018 में, उन्हें फ्लाइट 101 का जेट इंजन मिला, जिसके बाद उन्होंने दूसरे विमान से टक्कर की थ्योरी पर जोर दिया। उन्होंने कहा, ‘अगर एयर इंडिया का विमान पहाड़ से टकराता तो भीषण आग और विस्फोट हो जाता, क्योंकि विमान में 41,000 टन ईंधन था। मेरे हिसाब से एयर इंडिया का एक विमान एक इटालियन विमान से टकराया था। ऊंचाई अधिक होने के कारण ऑक्सीजन कम था इसलिए आग नहीं लगी।

Dr Homi Bhabha के बारे में रौश ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि विमान दुर्घटना उन्हें मारने की साजिश थी या नहीं, लेकिन वह भारत को पहला परमाणु हथियार देने वाले थे, इसलिए अगर भारत सरकार चाहे तो मैं उन्हें वहां से मिले भारतीय यात्रियों के दस्तावेज़ उन्हें दे सकता हूं। मेरी यह जिम्मेदारी है कि मैं दुनिया को सबूतों के आधार पर सच्चाई बताऊं।’

रौश ने फ्रांसीसी अधिकारियों पर बार-बार उन्हें रोकने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया। रौश ने दूसरे विमान का नाम F-104G स्टार फाइटर जेट बताया। रौश का कहना है, ‘1960 के दशक के आसपास, इटालियंस फ्रांसीसी सेना पर जासूसी करने के लिए स्टारफाइटर विमानों का इस्तेमाल करते थे। फ्रांसीसियों की नजर से बचने के लिए इसमें से ट्रांसपोंडर को हटा दिया था।

ट्रांसपोंडर की मदद से एक विमान दूसरे विमान को रेडियो सिग्नल भेजता है, जिसके जरिए पायलट एयर ट्रैफिक या दूसरे विमान की स्थिति का अनुमान लगा सकता है। रैश की थ्योरी के मुताबिक, स्टारफाइटर जेट एयर इंडिया के ‘कंचनजंगा’ से इसलिए टकराया क्योंकि उसमें ट्रांसपोंडर नहीं था। रैश का कहना है कि चूंकि ये मामला सेना से जुड़ा था इसलिए इसे वहीं दबा दिया गया।

ग्लोबल वॉर्मिंग से मिली थी मदद

यह सिद्धांत यहीं समाप्त हो गया होता यदि एक व्यक्ति ने इस विषय में विशेष रुचि न ली होती। रौश को एक अज्ञात दुश्मन, ग्लोबल वार्मिंग से मदद मिली। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस विमान दुर्घटना के रहस्य को सुलझाने में ग्लोबल वार्मिंग ने अहम भूमिका निभाई।

जिस स्थान पर विमान दुर्घटना हुई वह बॉसन ग्लेशियर नामक ग्लेशियर था। समय के साथ, ग्लेशियर एक स्थिर गति से आगे बढ़ता रहता है, आमतौर पर प्रति वर्ष लगभग एक मीटर। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण बॉसन ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल गया और ग्लेशियर के ऊपर की बर्फ जल्द ही नीचे तक पहुंच गई। साथ ही विमान का मलबा भी पहुंच गया. ग्लेशियर का निचला सिरा फ्रांस के शामनी क्षेत्र से केवल 4 किलोमीटर दूर है, इसलिए विमान के मलबे की जांच के लिए यह एक अच्छी जगह साबित हुई।

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