1943 बंगाल अकाल: कुत्ते-गिद्ध लाशों को खा रहे थे | 1943 Winston Churchill Bengal Famine in Hindi

1943 Winston Churchill Bengal Famine in Hindi

1943 बंगाल अकाल: कुत्ते-गिद्ध लाशों को खा रहे थे, 1943 Winston Churchill Bengal Famine in Hindi, विंस्टन चर्चिल: 40 लाख भारतीयों की मौत का जिम्मेदार, Churchill India Starvation, मुस्लिम लीग ने दिया अंग्रेजों का साथ, कांग्रेस नेताओं ने नहीं लिया एक्शन, नेताजी को थी बंगाल की चिंता, भारतीय सैनिकों में बढ़ गया असंतोष

दुनिया भर के लाइब्रेरी में उपलब्ध किताबों और कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पॉलिटिकल साइंस की किताबों ने निश्चित रूप से पूर्व ब्रिटिश प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) को एक महान और सख्त नेता के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन भारत के सन्दर्भ में वह एक क्रूर और निर्दयी नेता था। Winston Churchill की भारत के प्रति नफरत के कारण 1943 में बंगाल में 40 लाख लोग भूख से मर गए, क्योंकि चर्चिल ने उनके हिस्से का अनाज द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ रही अपनी सेना को बांट दिया था।

आपको जानकर हैरानी होगी कि बंगाल में पड़े इस अभूतपूर्व सूखे के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना ने Winston Churchill का साथ दिया था और लाखों लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया।

1943 Winston Churchill Bengal Famine in Hindi | 1943 बंगाल के अकाल का इतिहास

पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री Winston Churchill का जन्म 30 नवंबर, 1874 को हुआ था। चर्चिल 1940 से 1945 तक ब्रिटेन का प्रधानमंत्री रहा था। यह वही समय था जब महात्मा गांधी अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन चला रहे थे और ब्रिटेन मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के साथ जर्मनी के विरुद्ध द्वितीय विश्व युद्ध लड़ रहा था।

Churchill India Starvation in Hindi | 1943 बंगाल का अकाल

भारत आज भी 1947 के विभाजन को नहीं भूला है, जिसमें 10 से 20 लाख लोग मारे गये थे, लेकिन बंटवारे से चार साल पहले यानी 1943 में संयुक्त बंगाल में अकाल के दौरान 40 लाख लोग भूख से मर गए थे। यह अकाल प्राकृतिक कारणों से नहीं बल्कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री Winston Churchill के गलत फैसलों और नीतियों के कारण पड़ा था।

1943 में, द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन मित्र राष्ट्रों का नेतृत्व कर रहा था, जब बंगाल में सूखे के कारण भयंकर अकाल पड़ा। तब ब्रिटेन का तत्कालीन प्रधान मंत्री Winston Churchill और भारत का वायसराय विक्टर लिन-लिथगो था, जिसने तीन महीने पहले विंस्टन चर्चिल को चेतावनी दी थी कि भारत में बड़ा खाद्य संकट है और ब्रिटिश सरकार को इसके बारे में कुछ करना चाहिए। लेकिन Winston Churchill ने इन सभी चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया और भारत के हिस्से का अनाज द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ रहे सैनिकों के लिए भेज दिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि उस समय बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा और इस अकाल में लगभग 40 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। जब विंस्टन चर्चिल से इस बारे में पूछा गया तो उसका जवाब आपको गुस्से से भर देगा। उसने कहा:

“मुझे भारत के लोगों से नफरत है। भारत के लोग जानवरों की तरह हैं और उनका धर्म भी जानवरों की तरह है। यह सूखा भारत के लोगों की गलती है क्योंकि वे खरगोश की गति से बच्चे पैदा करते हैं।”

अंग्रेजों ने भारतीयों के हिस्से का अनाज छुपा लिया

Winston Churchill ने ब्रिटेन के लोगों के लिए 400 करोड़ किलोग्राम गेहूं और आटा, 140 करोड़ किलोग्राम चीनी और 160 करोड़ किलोग्राम मांस, 4 लाख 9 हजार जीवित जानवर, 32 करोड़ किलोग्राम मछली, 13 करोड़ किलोग्राम चावल, 20 करोड़ किलोग्राम चाय की पत्तियां और 41 लाख लीटर शराब का भंडारण करके रखा था, जबकि संयुक्त बंगाल जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल है, में लाखों लोग भूख से मर रहे थे।

जब बंगाल की जनता भूख से मर रही थी, तब अंग्रेज चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे और हाथ में महंगी शराब के गिलास लेकर भारत की गरीबी पर चर्चा कर रहे थे। हालाँकि, इससे भी अधिक अफसोस की बात यह है कि भारत के महान नेताओं ने कभी भी इस स्थिति के लिए ब्रिटिश सरकार को दोषी नहीं ठहराया और यहां तक ​​कि मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग पार्टी ने भी ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों में उसका साथ भी दिया।

मुस्लिम लीग अपने एजेंडे में व्यस्त थी

दरअसल, उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और ख्वाजा नजीमुद्दीन मुख्यमंत्री थे। उस समय भारत में अलग-अलग प्रांतीय सरकारें होती थीं और इन सरकारों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण था। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी लेकिन उसका एक ही उद्देश्य था, भारत का विभाजन। यह विभाजन तभी संभव हो सकता था जब इसके लिए ब्रिटिश सरकार राजी होती।

इसके लिए मुस्लिम लीग ने निर्णय लिया कि वह ब्रिटिश सरकार के किसी भी फैसले का विरोध नहीं करेगी और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी उसका खुलकर समर्थन करेगी। इस अवधि के दौरान जब बंगाल में अकाल पड़ा और लाखों लोग अपनी भूख मिटाने के लिए गाँवों और शहरों से पलायन कर कलकत्ता और ढाका की सड़कों पर एकत्र हुए, तो मुस्लिम लीग ने इन लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

मुस्लिम लीग ने दिया अंग्रेजों का साथ

जब ये मामला कुछ अखबारों में तस्वीरों के साथ छपा तो मुस्लिम लीग पर सवाल खड़े हो गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन की बदनामी भी हुई। उस समय कुछ अखबारों को छोड़कर ज्यादातर अखबारों में बंगाल के अकाल की खबरें आ रही थीं और अखबारों में कंकालों की तस्वीरें प्रमुखता से छप रही थीं।

इससे निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम लीग की मदद ली और तय हुआ कि जिन्ना की पार्टी कलकत्ता और ढाका की सड़कों पर पड़े कंकालों और भूख से तड़प रहे लोगों को ट्रकों में भरकर दूसरे शहरों में छोड़ेगी। मतलब मुस्लिम लीग ने विभाजन के लिए 40 लाख लोगों की हत्या में ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया था। इस बात का जिक्र ‘चर्चिल की सीक्रेट वॉर (Churchill’s Secret War)’ नाम की किताब में भी मिलता है।

समय होते हुए भी कांग्रेस नेताओं ने नहीं लिया एक्शन

साल 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन (Bharat Chhodo Andolan) शुरू किया और इस आंदोलन को खत्म करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 9 अगस्त 1942 को बॉम्बे में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। नेहरू, देश के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आज़ाद और सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कई कांग्रेस नेताओं को 1945 तक अहमदनगर किले में नजरबंद रखा गया था।

Bharat Chhodo Andolan

हालाँकि, साल 1942 में जब महात्मा गाँधी और नेहरू सहित कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, तब वे बंगाल की स्थिति से परिचित थे। वे चाहते तो जेल में रहते हुए भी बंगाल के लोगों की जान बचाने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बना सकते थे। 1943 में, अकाल के दौरान महात्मा गांधी 21 दिन की भूख हड़ताल जरूर की थी, लेकिन यह हड़ताल बंगाल के लोगों के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ थीं।

मई 1944 में जब महात्मा गांधी को खराब स्वास्थ्य के कारण बिना शर्त जेल से रिहा किया गया, तब भी वे बंगाल नहीं गए। जबकि, उस समय देश का बंटवारा 40 लाख लोगों की हत्या से भी बड़ा मुद्दा था। सितंबर 1944 में, महात्मा गांधी ने मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से मुलाकात की और विभाजन के आधार पर अपने विचार व्यक्त किए।

इस बैठक के बाद महात्मा गांधी जिन्ना की मांगों से असहमत थे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि महात्मा गांधीने जिन्ना से एक बार भी बंगाल में भूख से मरने वाले लाखों लोगों के बारे में बात नहीं की, जबकि बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और यह सरकार अंग्रेजों की मदद कर रही थी।

नेताजी को थी बंगाल की चिंता

नेताजी सुभाष चंद्र बोस बंगाल के लोगों को लेकर बहुत चिंतित थे। जब बंगाल में अकाल की खबर दुनिया भर में फैली तो अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने मदद की पेशकश की, लेकिन Winston charchill ने यह मदद लेने से इनकार कर दिया और कहा कि, ‘मुझे भारतीयों से नफरत है। ये गंदे लोग हैं, जिनका धर्म भी क्रूरता से भरा है।’

कल्पना कीजिए कि Winston charchill भारत के लोगों से कितनी नफरत करता था। 2 जुलाई 1943 को जब सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर पहुंचे तो उन्होंने ब्रिटिश सरकार को बंगाल के लोगों की मदद के लिए एक प्रस्ताव भी भेजा। तब उन्होंने कहा था कि वह अलग-अलग जहाजों में 1 लाख टन चावल भारत भेज सकते हैं और जापान इन जहाजों पर हमला भी नहीं करेगा। लेकिन Winston Churchill और ब्रिटिश सरकार इसके लिए तैयार नहीं थे।

अगर उस समय यह सहायता स्वीकार कर ली जाती तो इस एक लाख टन चावल से बंगाल के 16 लाख लोगों का चार महीने तक पेट भर जाता, लेकिन Winston Churchill ने ऐसा नहीं होने दिया।

राजनीति खेलता रहा Churchill

नेताजी का प्रस्ताव इसलिए भी ठुकरा दिया गया क्योंकि उस समय जापान ने बर्मा (आज का म्यांमार) पर कब्ज़ा कर लिया था। इस कब्जे के कारण बर्मा से भारत में चावल का आयात बंद हो गया था। इसे देखते हुए Winston Churchill ने ब्रिटिश सैनिकों के लिए चावल की जमाखोरी कर ली थी। चर्चिल को डर था कि यह अनाज जापान के हाथ लग जायेगा और वह इस पर कब्ज़ा कर लेगा, इससे बचने के लिए उसने ‘नजरअंदाज करने की नीति’ अपनाई।

इसके पीछे का विचार फसलों सहित सभी चीजों को नष्ट करना था। यहां तक कि फसलों के परिवहन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नावों को भी नष्ट कर दिया जाए ताकि जब जापान बंगाल पर कब्जा करने आए, तो उसके पास आगे बढ़ने के लिए कोई संसाधन न हों। इस नीति का असर यह हुआ कि अकाल और भी भीषण हो गया। लेकिन इसके बावजूद उस समय के नेताओं ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

भारतीय सैनिकों में बढ़ गया असंतोष

गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध में 20 लाख भारतीय सैनिकों ने ब्रिटेन के लिए लड़ाई लड़ी थी। लेकिन इस दौरान कम वेतन और जरूरी राशन नहीं मिलने के कारण भारतीय सैनिकों में समय के साथ असंतोष बढ़ता गया और शायद इसी वजह से द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पकड़े गए हजारों भारतीय सैनिक सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया।

ये असंतोष तब और बढ़ गया, जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 में आज़ाद हिन्द फ़ौज के तीन अधिकारियों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया गया। और यह गुस्सा 1946 के नौसेना विद्रोह (Naval Mutiny) के रूप में सामने आया, जब बॉम्बे के इन सैनिकों ने कई ब्रिटिश जहाजों पर कब्जा कर लिया और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार को एहसास हुआ कि भारत पर शासन करना मुश्किल है।

1943 में भारत में बंगाल का अकाल क्या था?

1943 का बंगाल का अकाल बीसवीं सदी के दक्षिण एशिया की सबसे भीषण आपदाओं में से एक था। यह अपने पैमाने की दृष्टि से विनाशकारी था, जिससे 40 लाख मौतें हुईं और यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई, जब भारत ब्रिटिश राज के अधीन था।

विंस्टन चर्चिल का बंगाल के अकाल से क्या संबंध था?

Winston Churchill की भारत के प्रति नफरत के कारण 1943 में बंगाल में 40 लाख लोग भूख से मर गए, क्योंकि चर्चिल ने उनके हिस्से का अनाज द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ रही अपनी सेना को बांट दिया था।

विंस्टन चर्चिल कौन था?

दुनिया भर के लाइब्रेरी में उपलब्ध पुस्तकों और कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पॉलिटिकल साइंस की किताबों ने निश्चित रूप से पूर्व ब्रिटिश प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) को एक महान और सख्त नेता के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन भारत के सन्दर्भ में वह एक क्रूर और निर्दयी नेता था, जो 1943 में बंगाल में पड़ी भुखमरी के लिए जिम्मेदार था।

बंगाल का प्रसिद्ध अकाल किस रोग के कारण पड़ा?

हालाँकि प्रशासनिक विफलताएँ इस मानवीय पीड़ा के लिए तत्काल जिम्मेदार थीं। 1943 में कम फसल आपूर्ति का मुख्य कारण ब्राउन स्पॉट रोग (Brown Spot Disease) की महामारी थी जिसने 1942 में बंगाल में चावल की फसल पर हमला किया था।

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