बदल गए अंग्रेजों के जमाने के IPC, CrPC, और एविडेंस एक्ट!

IPC, CrPC, and Evidence Act of the British era have changed

बदल गए अंग्रेजों के जमाने के IPC, CrPC, और एविडेंस एक्ट! क्या अब भारत में जल्द मिलेगा न्याय?, IPC यानी इंडियन पीनल कोड क्या है? What is CrPC, भारतीय आपराधिक कानून में बड़े बदलाव, हेट स्पीच पर सजा का प्रावधान, राजद्रोह कानून का इतिहास

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गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (11 अगस्त 2023) को लोकसभा में तीन बिल पेश किए। उन्होंने बिल पेश करते हुए सदन को बताया कि ब्रिटिश काल के आपराधिक कानूनों को अब बदला जाएगा। इनमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, भारतीय न्यायिक संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य विधेयक 2023 शामिल हैं।

ये विधेयक ब्रिटिश काल के भारतीय दंड संहिता (IPC-1860), आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC-1898) और साक्ष्य अधिनियम (1872) की जगह लेंगे।

What is IPC | IPC यानी इंडियन पीनल कोड क्या है?

आईपीसी को ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के पहले विधि आयोग की सिफारिशों पर पेश किया गया था। यह 1860 में अस्तित्व में आया लेकिन 1 जनवरी 1862 को भारतीय दंड संहिता के रूप में अधिनियमित किया गया। इसे तैयार करने की जिम्मेदारी विधि आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले को दी गई थी।

Objective | उद्देश्य

सिविल कानून और फौजदारी भी आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आते हैं। गंभीर अपराध के मामले में आईपीसी की धाराएं लगाई जाती हैं. आईपीसी भारतीय नागरिकों द्वारा किए गए अपराधों के साथ-साथ उनके लिए निर्धारित दंडों को भी परिभाषित करता है। इसमें 23 चैप्टर हैं और 511 धाराएं हैं। इसकी धाराएँ भारतीय सेना पर लागू नहीं होतीं।

What is CrPC | CrPC क्या है?

आमतौर पर पुलिस स्टेशनों में आईपीसी की धाराओं के तहत अपराध दर्ज किए जाते हैं, लेकिन उनकी जांच प्रक्रिया में सीआरपीसी का इस्तेमाल किया जाता है। इसका पूरा नाम दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure) है। आसान शब्दों में समझें तो पुलिस आपराधिक मामले आईपीसी के तहत दर्ज करती है, लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया सीआरपीसी के तहत शुरू होती है।

अगर कोई अपराध हुआ है तो पुलिस अपराधी पर आईपीसी की धारा तो लगा देगी, लेकिन उसे गिरफ्तार कैसे किया जाएगा, अगर कोर्ट के आदेश के बाद भी अपराधी वहां नहीं पहुंचे तो पुलिस क्या प्रक्रिया अपनाएगी? ऐसी तमाम बातों की जानकारी पुलिस को सीआरपीसी से मिलती है।

सीआरपीसी के तहत पुलिस को कई अधिकार मिले हुए हैं। अपराध को दो भागों में बांटा गया है, पहला भाग अपराधी की जांच और दूसरा भाग पीड़ित की जांच। इनसे जुड़ी प्रक्रियाओं की जानकारी सीआरपीसी में दी गई है। इसे भारत में आपराधिक कानून लागू करने के लिए लागू किया गया था। देश में सीआरपीसी को लागू करने के लिए 1973 में कानून बनाया गया था, लेकिन यह 1 अप्रैल 1974 को लागू हुआ।

पुरानानया
इंडियन पीनल कोड (IPC)भारतीय न्याय संहिता 2023
कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर (CrPC)भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023
एविडेंस एक्टभारतीय साक्ष्य बिल 2023
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 : अपराधों से संबंधित प्रावधानों को समेकित और संशोधित करने के लिए और उससे जुड़े या उसके आकस्मिक मामलों के लिए।
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: दंड प्रक्रिया से संबंधित कानून को समेकित और संशोधित करने और उससे जुड़े या उसके प्रासंगिक मामलों के लिए।
  • भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023: निष्पक्ष सुनवाई के लिए साक्ष्य के सामान्य नियमों और सिद्धांतों को समेकित करने और प्रदान करने के लिए।

सशस्त्र विद्रोह भड़काने और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोप में जेल

दिसंबर में लोकसभा में बिल पेश करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि राजद्रोह कानून अंग्रेजों ने बनाया था, जिसके कारण तिलक, गांधी, पटेल समेत देश के कई सेनानी 6-6 साल तक जेल में रहे। वह कानून अब तक चलता रहा। इसे राजद्रोह की जगह देशद्रोह में बदल दिया गया है, क्योंकि अब देश आजाद हो गया है, लोकतांत्रिक देश में कोई भी सरकार की आलोचना कर सकता है।

शाह ने कहा था- अगर कोई देश की सुरक्षा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाएगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अगर कोई सशस्त्र विरोध प्रदर्शन या बम विस्फोट करेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी, उसे आजाद रहने का कोई अधिकार नहीं है, उसे जेल जाना होगा। कुछ लोग इसे अपने शब्दों में ढालने की कोशिश करेंगे, लेकिन मैंने क्या कहा उसे अच्छी तरह से समझें, देश का विरोध करने वाले को जेल जाना पड़ेगा।

इसके साथ ही नाबालिग लड़की से दुष्कर्म करने पर भी मौत की सजा का प्रावधान किया गया है। नए कानून महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों के लिए सजा को प्राथमिकता देते हैं। 2027 से पहले देश की सभी अदालतें कंप्यूटरीकृत हो जाएंगी। जब किसी को गिरफ्तार किया जाएगा तो सबसे पहले उसके परिवार को सूचना दी जाएगी।

बच्ची से दुष्कर्म के दोषी को फांसी की सजा

पहले बलात्कार के लिए धाराएं 375, 376 थीं, अब जहां से अपराधों की चर्चा शुरू होती है, वहां बलात्कार को धारा 63, 69 में शामिल कर दिया गया है। सामूहिक बलात्कार को भी आगे रखा गया है। बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध भी सामने आये हैं। हत्या 302 थी, अब 101 हो गई। 18 साल से कम उम्र की लड़की से बलात्कार के लिए आजीवन कारावास और मौत का प्रावधान है। सामूहिक बलात्कार के दोषी पाए जाने वालों को 20 साल तक की कैद या जब तक वे जीवित हैं तब तक जेल की सजा दी जाएगी।

तीनों बिल पेश करते हुए अमित शाह ने कहा- पुराने कानूनों का फोकस ब्रिटिश प्रशासन को मजबूत करना और उसकी रक्षा करना था। उनके द्वारा लोगों को न्याय नहीं सजा दी जाती थी। 1860 से 2023 तक देश की आपराधिक न्याय प्रणाली ब्रिटिश कानून द्वारा शासित थी। नए विधेयकों का उद्देश्य सजा नहीं बल्कि न्याय देना है।

उन्होंने कहा- प्रधानमंत्री ने पिछले 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश के सामने 5 प्रतिज्ञाएं की थीं। उनमें से एक प्रतिज्ञा थी कि हम गुलामी के सभी निशान ख़त्म कर देंगे। मैं आज जो तीन बिल लेकर आया हूं, ये तीनों बिल मोदी जी के एक वादे को पूरा कर रहे हैं।

What changes in CrPC | CrPC में क्या बदलाव?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सदन को बताया कि भारतीय नागरिक संहिता, 2023 में 533 धाराएं बरकरार रहेंगी, सीआरपीसी में बदलाव के बाद 160 धाराएं बदल दी गई हैं. विधेयक में 9 नए खंड जोड़े गए हैं और 9 खंड निरस्त किए गए हैं।

What changes in IPC | IPC में क्या बदलाव?

आईपीसी में बदलाव को लेकर गृह मंत्री ने कहा कि पहले आईपीसी में 511 धाराएं थीं. अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में केवल 356 धाराएं होंगी। 175 धाराओं में संशोधन किया गया है, 8 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 22 धाराएं निरस्त की गई हैं।

इंडियन एविडेंस एक्ट में क्या बदलाव किये?

अमित शाह ने कहा कि पहले भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 167 धाराएं थीं लेकिन, अब भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 में 170 धाराएं होंगी। उसके लिए 23 धाराएं बदली गईं. एक नई धारा जोड़ी गई है और 5 धाराएं निरस्त कर दी गई हैं।

Evidence Act of the British era have changed

Major changes in Indian criminal law | भारतीय आपराधिक कानून में बड़े बदलाव

  • नई सीआरपीसी में 356 धाराएं होंगी, जबकि पहले इसमें कुल 511 धाराएं थीं।
  • 7 साल से अधिक की सजा वाले मामलों में फोरेंसिक टीम द्वारा साक्ष्य जुटाए जाएंगे।
  • देश छोड़कर भाग चुके भगोड़ों की अनुपस्थिति में कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषी करार देने का प्रावधान।
  • अब सुनवाई पूरी होने के 30 दिन में कोर्ट को हर हाल फैसला सुनाना होगा।
  • तलाशी और जब्ती की वीडियो बनाना अब अनिवार्य होगा।
  • अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो, लेकिन एफआईआर देश के किसी भी हिस्से में दर्ज कराई जा सकती है।
  • 90 दिन के अंदर चार्जशीट दाखिल करनी होगी और 180 दिन के अंदर जांच पूरी करनी होगी।
  • पहचान बदलकर लव जिहाद करने वाले यौन शोषण करने वालों के लिए सजा का प्रावधान होगा।
  • नाबालिग लड़कियों से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में मौत की सजा का प्रावधान होगा।
  • बच्चों और महिलाओं से जुड़े अपराधों के लिए 10 साल तक की सज़ा।

Provision for punishment on hate speech | हेट स्पीच पर सजा का प्रावधान

नए कानूनों में नफरत फैलाने वाले भाषण और धार्मिक भड़काऊ भाषण को भी अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है। नफरत फैलाने वाला भाषण देने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की कैद और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। इसके अलावा धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने और किसी वर्ग, श्रेणी या अन्य धर्म के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने पर 5 साल की सजा का प्रावधान होगा।

नए कानूनों के तहत मॉब लिंचिंग यानी जब 5 या अधिक लोगों का समूह मिलकर जाति या समुदाय आदि के आधार पर हत्या करता है तो समूह के हर सदस्य को उम्रकैद की सजा दी जाएगी।

What changed regarding sedition law | देशद्रोह कानून को लेकर क्या बदला?

नए बिल से राजद्रोह कानून का नाम हटा दिया गया है, बल्कि अब धारा 150 के तहत आरोप तय किये जायेंगे। जिसमें आजीवन कारावास या तीन साल तक की कैद हो सकती है। दोषियों की संपत्ति कुर्क करने का आदेश कोई पुलिस अधिकारी नहीं बल्कि कोर्ट देगा। इसके अलावा इस मामले के दोषियों को 3 साल के अंदर न्याय मिलेगा। राजद्रोह कानून को अभी IPC की धारा 124A के नाम से जाना जाता है।

Is it different from treason | क्या यह देशद्रोह से अलग है?

राजद्रोह, देश द्रोह से बिल्कुल अलग है। हम आपको बता दें कि देश द्रोह कानून का इस्तेमाल केवल उन्हीं लोगों के खिलाफ किया जा सकता है जो देश के खिलाफ किसी कार्य में शामिल हों या किसी ऐसे संगठन से संपर्क रखते हों जो देश के खिलाफ काम कर रहा हो, इसके साथ ही आतंकवादी विचारधारा वाले व्यक्ति या किसी संगठन के संपर्क में रहने वाले व्यक्ति के खिलाफ देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया जाता है।

वहीं, युद्ध या उससे जुड़ी गतिविधियों में विरोधी देश का समर्थन करना भी देशद्रोह की श्रेणी में आता है। इसमें दोषी पाए जाने पर आरोपी को उम्रकैद की सजा हो सकती है, जबकि, राजद्रोह की सजा मामूली है।

History of sedition law | राजद्रोह कानून का इतिहास

राजद्रोह कानून को हम भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के नाम से भी जानते हैं। यह कानून 17वीं सदी में अंग्रेजों ने बनाया था, हालाँकि, यह कानून मूल रूप से 1837 में ब्रिटिश इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थॉमस मैकाले द्वारा तैयार किया गया था। उस समय ब्रिटिश सरकार इस अधिनियम का प्रयोग उन लोगों के खिलाफ करती थी जो सरकार के बारे में अच्छी राय या विचार नहीं रखते थे और सार्वजनिक रूप से उसके खिलाफ बोलते थे।

On whom was this stream first | यह धारा सबसे पहले किस पर लगी थी?

ब्रिटिश शासन के बाद जब भारत स्वतंत्र हुआ तब भी यह कानून भारतीय दंड संहिता में बरकरार रहा। हालाँकि, अब यह सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वालों पर नहीं लगाया जाता। बल्कि, इस धारा का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया गया था जो भाषण, लेखन, इशारा या संकेत या किसी अन्य माध्यम से नफरत फैलाते हैं, या भारतीय कानूनों या सरकारी आदेशों की अवमानना करते हैं, या लोगों के बीच असंतोष भड़काने का प्रयास करते हैं, उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाता है।

भारत में इस कानून का इस्तेमाल सबसे पहले 1897 में बाल गंगाधर तिलक के विरुद्ध किया गया था। इसके अलावा इस कानून का इस्तेमाल 19 मार्च 1922 को महात्मा गांधी के खिलाफ भी किया गया था। इसके साथ ही इस कानून का इस्तेमाल पंडित जवाहरलाल नेहरू और भगत सिंह के खिलाफ भी किया गया था।

किन देशों ने इस कानून को खत्म कर दिया है

ब्रिटेन: 14 साल पहले निरस्त हुआ कानून – दुनिया को देशद्रोह का कानून देने वाले देश ने 13 साल पहले यानी 2009 में इसे खत्म कर दिया। ब्रिटेन में यह कानून 12 जनवरी 2010 से निरस्त कर दिया गया है। हालाँकि, विदेशी नागरिकों पर अभी भी देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा सकता है।

न्यूज़ीलैंड: 2007 में समाप्त हुआ – न्यूज़ीलैंड की संसद ने देशद्रोह कानून को निरस्त करने के लिए एक संशोधन विधेयक को भारी बहुमत से पारित कर दिया। 114 सांसद संशोधन बिल के पक्ष में थे, जबकि सिर्फ 7 सांसद इसके विरोध में थे। संशोधन विधेयक 24 अक्टूबर 2007 को पारित किया गया और 1 जनवरी 2008 को लागू हुआ।

स्कॉटलैंड: कानून13 वर्ष पहले समाप्त हो गया – स्कॉटलैंड ने 2010 में एक विधेयक के माध्यम से देशद्रोह अधिनियम को निरस्त कर दिया।

इंडोनेशिया: 2007 में ख़त्म – इंडोनेशिया ने 2007 में देशद्रोह कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

घाना: 22 साल पहले खत्म कर दिया – घाना की संसद ने सर्वसम्मति से देशद्रोह अधिनियम को निरस्त कर दिया।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने देशद्रोह से निपटने के लिए अपने कानूनों के विभिन्न प्रावधानों को रद्द कर दिया है या दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून की लैंग्वेज में बदलाव किया।

ऑस्ट्रेलिया: 2010 में बदल दिया गया – ऑस्ट्रेलिया में पहला व्यापक कानून जिसमें देशद्रोह का अपराध शामिल था, वह अपराध अधिनियम 1920 था। इसे 1984 और 1991 में दो बार संशोधित किया गया। इसके बाद, 2010 के ऑस्ट्रेलियाई कानून सुधार आयोग यानी ALRC की सिफारिश के बाद, राष्ट्रीय सुरक्षा संशोधन अधिनियम 2010 में देशद्रोह शब्द को हिंसा के लिए उकसाने के अपराध में बदल दिया गया।

अमेरिका: मृत कानून का रूप ले चुका है – इस बात पर काफ़ी बहस के बावजूद कि क्या देशद्रोह को ख़त्म करना सही विकल्प है, संयुक्त राज्य अमेरिका में यह एक अपराध बना हुआ है। हालाँकि, अमेरिका में इसे लगभग मृत कानून माना जाता है। अमेरिका में 1798 के देशद्रोह अधिनियम द्वारा इसे दंडनीय अपराध बना दिया गया। यह अधिनियम 1820 में निरस्त कर दिया गया। हालाँकि, 1918 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने फिर से देशद्रोह अधिनियम पारित किया, क्योंकि कांग्रेस प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी हितों की रक्षा करना चाहती थी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इन तीन कानूनों की जगह जो तीन नए कानून बनेंगे, उनमें भारतीयों को अधिकार देने की भावना होगी। इन कानूनों का उद्देश्य किसी को दंडित करना नहीं होगा बल्कि इसका मकसद लोगों को न्याय दिलाना होगा। उन्होंने कहा कि 18 राज्यों, 6 केंद्र शासित प्रदेशों, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, 22 उच्च न्यायालयों, न्यायिक संस्थानों, 142 सांसदों और 270 विधायकों के अलावा जनता ने भी इन विधेयकों पर सुझाव दिए हैं। चार साल से इस पर खूब चर्चा हो रही है. हमने इस पर 158 बैठकें की हैं।

नए कानून के नोटिफिकेशन के बाद क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं, नए आपराधिक कानून के लागू होने की तारीख जो भी हो, उस तारीख से जब अपराध होगा तो वह नए कानून में दर्ज होगा। उसके अनुरूप मुकदमा चलाया जाएगा और सजा दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि नए केस में IPC, CrPC और एविडेंस एक्ट का असर नहीं होगा।

दर्ज FIR और पेंडिंग मामलों पर क्या होगा असर?

पहले से दर्ज मामलों में पहले के कानून के तहत ही आरोप पत्र दायर किया जाएगा और पहले के कानून के तहत ही मुकदमा चलाया जाएगा और सजा दी जाएगी। जो मामले अदालतों में लंबित हैं उनकी सुनवाई पहले की तरह जारी रहेगी. उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

टेरर एक्ट और संगठित अपराध पर क्या संदेह हैं?

कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट एम.एस. खान बताते हैं कि अब तक आतंकवाद से जुड़े अपराधों पर UAPA के तहत कार्रवाई की जाती रही है। इसके अलावा संगठित अपराध के मामलों से निपटने के लिए मकोका भी है। अब मौजूदा विधेयक में इन दोनों प्रकार के अपराधों को धारा 111 में संगठित अपराध और धारा 113 में आतंकवादी गतिविधि के रूप में शामिल किया गया है। ऐसी स्थिति में विशेष अधिनियम के औचित्य पर संदेह है।

मकोका क्या है?

महाराष्ट्र सरकार ने 1999 में मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट) लागू किया। इसका उद्देश्य संगठित और अंडरवर्ल्ड अपराध को खत्म करना था। यह कानून महाराष्ट्र और दिल्ली में लागू है। इसके तहत अंडरवर्ल्ड से जुड़े अपराधियों और जबरन वसूली समेत अवैध गतिविधियां, जिनके जरिए बड़े पैमाने पर पैसा कमाया जाता है, से जुड़े मामले शामिल हैं। मकोका लगने पर जमानत नहीं मिलती।

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